सार्वभौमिकता के स्वामी का कहीं निजीकरण ना हो जाये

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सार्वभौमिकता के स्वामी का कहीं निजीकरण ना हो जाये

स्वामी विवेकानंद - Swami Vivekanand[aph] बादल सिंह ठाकुर (खरसिया) के कलम से [/aph] स्वार्थ कभी किसी को महान बनने नहीं देता है इसलिए वर्तमान में अपना स्वार्थ पूरा करने हेतु महान व्यक्तियों का कॉपी राइट लेना आम फैशन बन चूका है. जिनके स्वयं के कोई सिद्धान्त नहीं आज उनके द्वारा महान व्यक्तियों के सिद्धान्तों को तोड़ मरोड़ कर सहूलियत का आकर दे दिया जाता है और स्वार्थ पूरा किया जाता है। ऐसे लोगों द्वारा हाशिये में रखे गए कुछ महान चरित्रों में से एक चरित्र है “स्वामी विवेकानंद

स्वामी जी का जन्म सं 1863 में आज ही के दिन (January 12, 1863) कोलकाता में हुवा था, विद्या की देवी सरस्वती और गुरु रामकृष्ण परमहंस की कृपा ने एक नास्तिक बालक नरेन्द्रनाथ दत्त को स्वामी विवेकानंद बना दिया जिन्होंने अपना पूरा जीवन समग्र विश्व को भारतीय संस्कृति और मानवता का बोध कराने में लगा दिया। 6 वर्षों की पैदल यात्रा कर तथा कई बार भूखे रहकर उन्होंने भारत भ्रमण किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे की भारतीय संस्कृति एवं युवाओं की सहायता से भारत सहित विश्व के अन्य देशों का पुनर्निर्माण किया जा सकता है मृततुल्य देशों में प्राण फूंके जा सकते हैं इस लक्ष्य ने इन्हें 1893 के शिकागों में हो रहे धर्म सम्मलेन में बिना निमंत्रण ही पहुँच जाने में विवश लार दिया उस धर्ममंच से उन्होंने जिस प्रकार से हिन्दू धर्म, भारतीय संस्कृति और मानवता की व्याख्या की जिससे अभिभूत होकर अमेरिका ने भी मान लिया भारत ही विश्वगुरु था और आज भी है। यह सोचनें का विषय है उस धर्म संसद में स्वामी जी ने ऐसा क्या कहा जिससे पूरा धर्मसंसद भाव विभोर हो गया,उन्होंने अपने भाषण से हिन्दुधर्म की सार्वभौमिकता एवं सहनशीलता का अद्वैत परिचय दिया और सिद्ध किया की किस प्रकार विश्व भर में सताये गए कई धर्मों के धर्मावलंबियों को किस प्रकार भारत माता ने अपनाया और अपार प्रेम दिया, हम केवल सार्वभौमिक और सहनशील ही नहीं अपितु सभी धर्मों को सत्य मानने वाले तथा सम्मान करने वाले हैं, उन्होंने यह बताया की हिन्दू धर्म सभी धर्मों तथा मानवता की रक्षा करने हेतु बाध्य है और मानवता ही हम हिंदुओं का परम धर्म है और यही वह मुख्य कारण था जिससे धर्म संसद ने भी हिन्दू धर्म को धर्म,संस्कृति और मानवता की जननी स्वीकार किया।

👉इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है की साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और कट्टरता के धुर विरोधी रहे ऐसे महापुरुष का आज सांप्रदायिक मंचों में चित्र रखकर उनके चरित्र का चित्रण किया जाता है और हठधर्मिता  का खुला प्रचार किया जाता है।सहिष्णुता के गुरु का चित्र अपने बैनर में लगाकर असहिष्णुता का पाठ पढाया जाता है,मानवता की सेना तैयार करने वाले इस महापुरुष का माल्यार्पण कर धर्म से धर्म को लडाने हेतु सेना का निर्माण किया जाता है।

👉आज हिन्दू धर्मसंगठन अपने समाज में फैली हुवी कुरीतियों के खिलाफ लड़ने में पूर्ण रूप से असमर्थ है, हर दशक में एक नया हिन्दू संगठन जन्म लेता है परंतु कभी पीड़ित महिलाओं बच्चों के उत्थान करने उन्हें शिक्षित करने में उनका ध्यान नहीं गया, छुवा छुत की भावना में लिप्तता के कारण दलितों की दयनीय परिस्थितियों पर किसी संगठन का ध्यान नहीं जबकि स्वामीजी ने इन मुद्दों पर कार्य करने हेतु ही हिन्दू संगठनों का मार्गदर्शन किया था आज उनके विचारों को दरकिनार कर केवल फ़ोटो से काम लिया जाता है और पुरे भारत को भगवा करने ला स्वप्न देखा जाता है जबकि बाजारात के अनेक रंग ही इस पवित्र धरा की खूबसूरती है और सभी रंगों का चौकीदार ही हिन्दू कहलाता है । स्वामी जी के मरणोपरांत यदि उनके विचारों को सत्यता के साथ भारतीय युवाओं तक पहुँचाया जाता तो आज सीरिया में हो रहे गृहयुद्ध को विवेकानद की विचारधारा रोक सकती थी, परंतु यदि आज भी स्वामी विवेकानंद के विचारों को समझा गया तो आने वाले भारत को सीरिया बनने से रोका जा सकता है।

👉मानवता के पुजारी तथा स्वामीजी के गुरु रामकृष्ण परमहंस जिन्हें यह पूर्ण विश्वास था की उन्हें ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं और इस कठिन मार्ग में चलते हुवे इन्हें यह निष्करह प्राप्त हुवा की संसार के सभी धर्म सच हैं उनमे कोई भिन्नता नहीं है यह केवल ईशवर ले प्राप्ति के साधन मात्र हैं और सभी धर्मों का पूर्ण संम्मान करना ही मानव धर्म है भला ऐसे गुरु के शिष्य को किसी एक धर्म में बंधना क्या उचित है?

👉हमें आज यह समझने की आवश्यकता है की स्वामी विवेकानंद में केवल हिंदुओं का नहीं अपितु समग्र विश्व के धर्मावलंबियों का पूर्ण एवं सामान अधिकार है स्वामीजी का जन्म दिवस “युवा दिवस” के रूप में तब सफल होगा जब हर युवा तक इनके विचार पहुचाये जा सके आज इस आध्यात्मिक पंछी को आजाद करने की आवश्यकता है ऐसे अतुल्य विचार स्वतः ही अपने लिए मस्तिष्क और आत्मा ढूंढ निकालते है।

[aph] स्वामी विवेकानद के कुछ अनमोल वचन [/aph]

👉ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्धि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं – इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।

👉आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।

👉पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो, और काम करो। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। मेरे बच्चे, आत्मविशवास रखो, सच्चे और सहनशील बनो।

👉गम्भीरता के साथ शिशु सरलता को मिलाओ। सबके साथ मेल से रहो। अहंकार के सब भाव छोड दो और साम्प्रदायिक विचारों को मन में न लाओ। व्यर्थ विवाद महापाप है।

[author title=”बादल सिंह ठाकुर (खरसिया)” image=”http://mycitymychoice.com/wp-content/uploads/2016/01/Badal-Singh-Thakur.jpg”] Badal Singh Thakur is from Kharsia, Chhattisgarh and a well known social activist cum NSUI member.[/author]

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